Padhe likhe gulam

बेड़ियों को आज़ादी का नाम दे रहे हो


जुर्म को धर्म का अंजाम कह रहे हो


जहाँ को जिया है मजबूरी के तौर पर


बड़ी खुश होंगे आज तुम


अखिर मुर्खों को पढ़े लिखे गुलाम दे रहे हो।

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